Sankashti Chaturthi Vrat Katha – संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

संकष्टी चतुर्थी आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाई जाती है। चतुर्थी का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है, ऐसे में आज हम आपको संकष्टी चतुर्थी व्रत के दिन सुनी जानें वाली कथा के बारे में बताने जा रहे है। आइए जानते है संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा

एक बार सभी देवी-देवता बहुत परेशान थे और उस समस्या से निजात पाने के लिए वे सभी भगवान भोलेनाथ के चरणों में गए। सभी देवों की समस्याओं को सुनकर भगवान शिव ने इसके समाधान के लिए अपने दोनों पुत्रों, भगवान गणेश और कार्तिकेय से कहा। इस बात पर दोनों भाइयों ने सहमती जताई।

उन दोनों की बात सुनकर भगवान शिव असमंजस में पड़ गए। उन्होंने दोनों से कहा की जो भी इस पृथ्वी का चक्कर सबसे पहले लगाकर वापस आएगा, वह इस समस्या का निवारण करेगा। भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर विराजमान होकर पृथ्वी की परिक्रमा लगाने के लिए निकल गए, वहीं भगवान गणेश की सवारी मूषक है और मोर की तुलना में मूषक के द्वारा पहले पृथ्वी के चक्कर लगाना संभव नहीं था।

गणेश जी जानते थे कि मूषक पर सवार होकर तो वे पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले नहीं कर सकते है, इसलिए उन्होंने अपनी बुद्धि का इस्तेमाल किया और एक युक्ति सोची। वे माता पार्वती और भोलेनाथ के पास गए और फिर हाथ जोड़कर उनके चारों ओर 7 बार परिक्रमा की।

जब कर्तिकेय जी परिक्रमा करके लौटे तो गणेश जी को अपनी जगह पर बैठा देखकर, उन्होंने स्वयं को विजयी घोषित कर दिया। भगवान शिव ने इस बात पर गणेश जी से सवाल किया की वे पृथ्वी की परिक्रमा लगाने क्यों नहीं गए?

इस बात पर गणेश जी ने उत्तर देते हुए कहा कि माता-पिता के चरणों में ही उनका पूरा संसार है, इसलिए उन्होंने अपने माता पिता के चारों ओर परिक्रमा दी। गणेश जी ने अपने इस उत्तर से मां पार्वती और भोले नाथ को प्रसन्न कर दिया। जिसके बाद देवताओं के कष्ट को दूर करने के लिए भगवान शिव ने गणेश जी को भेजा।

इसके साथ ही भगवान शंकर ने गणेश जी को यह आशीर्वाद भी दिया की जो भी व्यक्ति चतुर्थी के दिन उनकी पूजा-अर्चना करेगा और चन्द्रमा को जल चढ़ाएगा, उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।

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